स्फूर्ति योजना (SFURTI) – पारंपरिक उद्योगों के पुनरुत्थान की राष्ट्रीय पहल

.SFURTI योजना का सफल संचालन विभिन्न नोडल एजेंसियों के आपसी समन्वय पर आधारित है। इसमें खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) खादी और ग्रामोद्योग क्लस्टर्स के प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाता है, जबकि कोयर बोर्ड विशेष रूप से नारियल जटा आधारित क्लस्टर्स के विकास पर केंद्रित है।

सरकारी योजनाएं (GOVT SCHEMES)

Tej Prakash

2/1/20261 मिनट पढ़ें

स्फूर्ति योजना (SFURTI) – पारंपरिक उद्योगों के पुनरुत्थान की राष्ट्रीय पहल

भारत अपनी समृद्ध हस्तशिल्प, खादी, ग्रामोद्योग और नारियल रेशा (कोयर) जैसी पारंपरिक उद्योग विरासत के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इन उद्योगों से लाखों कारीगरों की आजीविका जुड़ी है। इन्हीं पारंपरिक उद्योगों को संगठित, आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) द्वारा स्फूर्ति योजना (SFURTI – Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries) संचालित की जा रही है। यह योजना पारंपरिक कारीगरों को क्लस्टर मॉडल के माध्यम से सशक्त बनाने की एक व्यापक पहल है।

स्फूर्ति योजना की पृष्ठभूमि

स्फूर्ति योजना का मुख्य उद्देश्य बिखरे हुए पारंपरिक कारीगरों और सूक्ष्म उत्पादकों को क्लस्टर (समूह) के रूप में संगठित करना है, ताकि उन्हें बेहतर बुनियादी ढांचा, आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, डिज़ाइन सुधार और बाज़ार तक पहुंच मिल सके। इससे उनकी आय बढ़े, उत्पादों की गुणवत्ता सुधरे और उद्योग दीर्घकालीन रूप से टिकाऊ बन सकें।

SFURTI (Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries) योजना मुख्य रूप से पारंपरिक कारीगरों और ग्रामीण उद्योगों को सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है। यहाँ इस योजना के लाभ, भागीदारी की प्रक्रिया और इसके पक्ष-विपक्ष (Pros & Cons) का विवरण दिया गया है:

आम लोगों और कारीगरों के लिए लाभ (Benefits)

* आय में वृद्धि: योजना का मुख्य उद्देश्य कारीगरों की उत्पादकता और उनकी आय में सुधार करना है।

* कौशल विकास: कारीगरों को आधुनिक तकनीक, मशीन संचालन और नए डिजाइनों के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।

* बुनियादी ढांचा: कारीगरों को 'सामान्य सुविधा केंद्र' (CFC) और वर्कशेड उपलब्ध कराए जाते हैं, जहाँ वे आधुनिक मशीनों का उपयोग कर सकते हैं।

* बाजार पहुंच: उत्पादों की ब्रांडिंग, बेहतर पैकेजिंग और ई-कॉमर्स (ऑनलाइन बिक्री) के माध्यम से उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुँचाया जाता है।

* सामाजिक सुरक्षा: योजना के तहत कारीगरों का बैंक खाता खोलना और उन्हें प्रधान मंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) और सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) जैसी बीमा योजनाओं से जोड़ना अनिवार्य है।

कौन भाग ले सकता है? (Eligibility)

योजना में दो स्तरों पर भागीदारी होती है:

* कारीगर/उत्पादक: खादी, ग्रामोद्योग और कॉयर (नारियल जटा) से जुड़े पारंपरिक कारीगर। इसमें महिलाओं, SC/ST समुदायों और पिछड़े वर्गों के कारीगरों को प्राथमिकता दी जाती है।

* कार्यान्वयन एजेंसियां (IA): जो क्लस्टर का प्रबंधन करती हैं। इनमें शामिल हो सकते हैं:

* स्वयं सहायता समूह (SHGs) और कारीगरों के संघ।

* पंजीकृत गैर-सरकारी संगठन (NGOs)।

* पंचायती राज संस्थान (PRIs)।

* निजी क्षेत्र के भागीदार (विशेष शर्तों के साथ)।

3. आवेदन कैसे करें? (How to Apply)

आवेदन की प्रक्रिया पूरी तरह से डिजिटल है:

* पोर्टल पर पंजीकरण: इच्छुक एजेंसी (IA) को SFURTI पोर्टल पर अपनी प्रोफाइल और क्लस्टर का कॉन्सेप्ट नोट अपलोड करना होगा।

* नोडल एजेंसी का चयन: आवेदन के दौरान एक नोडल एजेंसी (जैसे KVIC या कोयर बोर्ड) का चुनाव करना होता है।

* सत्यापन और DPR: नोडल एजेंसी कारीगरों की मौजूदगी का भौतिक सत्यापन करती है। इसके बाद एक तकनीकी एजेंसी (TA) की मदद से 'विस्तृत परियोजना रिपोर्ट' (DPR) तैयार की जाती है।

* अंतिम स्वीकृति: मंत्रालय की 'स्कीम स्टीयरिंग कमेटी' (SSC) द्वारा प्रस्ताव की समीक्षा के बाद क्लस्टर को मंजूरी दी जाती है।

पक्ष और विपक्ष (Pros and Cons)

सामूहिक शक्ति: अकेले काम करने वाले कारीगर एक समूह (SPV) बनकर बड़ी मशीनों और बड़े ऑर्डर्स का लाभ उठा पाते हैं. |

सरकारी अनुदान: हार्ड इंटरवेंशन (मशीनें/भवन) और सॉफ्ट इंटरवेंशन (ट्रेनिंग) के लिए भारी वित्तीय सहायता मिलती है.

स्थिरता: 10 वर्षों तक क्लस्टर की निगरानी की जाती है ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके.

आधुनिकता: पारंपरिक कला को ई-कॉमर्स और नई डिजाइन तकनीक से जोड़कर विलुप्त होने से बचाया जाता है

कठिनाइयां (Cons/Challenges)

हिस्सेदारी की आवश्यकता: कार्यान्वयन एजेंसी को कुल लागत का 5% से 10% स्वयं वहन करना पड़ता है. |

भूमि की उपलब्धता: क्लस्टर के लिए उपयुक्त और कानूनी रूप से स्पष्ट भूमि का प्रबंध करना एक बड़ी चुनौती होती है.

प्रबंधन कौशल: ग्रामीण कारीगरों के लिए व्यावसायिक प्रबंधन और डिजिटल लेनदेन को समझना शुरू में कठिन हो सकता है.

जटिल प्रक्रिया: आवेदन से लेकर क्लस्टर शुरू होने तक की प्रक्रिया लंबी और दस्तावेजीकरण वाली हो सकती है [cite: 551-561].

इस योजना के अंतर्गत प्रमुख पारंपरिक उद्योगों को तीन श्रेणियों में रखा गया है:

1. खादी उद्योग

2. ग्रामोद्योग

3. कोयर (नारियल रेशा) उद्योग

2. योजना के मुख्य उद्देश्य

स्फूर्ति योजना केवल वित्तीय सहायता नहीं देती, बल्कि एक समग्र विकास मॉडल पर आधारित है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं:

कारीगरों को समूहों में संगठित कर उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना

पारंपरिक उद्योगों में स्थायी रोजगार सृजित करना

उत्पादों की बाज़ार क्षमता बढ़ाने हेतु डिज़ाइन, पैकेजिंग और ब्रांडिंग सुधार

कारीगरों को कौशल उन्नयन प्रशिक्षण देना

आधुनिक तकनीक, नवाचार और ई-कॉमर्स को बढ़ावा देना

अनुसूचित जाति, जनजाति, महिलाओं और वंचित वर्गों पर विशेष ध्यान

ग्रीन और सतत उत्पादन प्रक्रियाओं को प्रोत्साहन

“लोकल टू ग्लोबल” और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में योगदान

3. स्फूर्ति के अंतर्गत सहायता के प्रकार

योजना में तीन प्रकार के हस्तक्षेप (Interventions) शामिल हैं:

(A) सॉफ्ट इंटरवेंशन (Soft Interventions)

इनका उद्देश्य मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता बढ़ाना है:

कारीगरों के लिए प्रशिक्षण एवं कौशल विकास

डिज़ाइन सुधार और उत्पाद विकास

जागरूकता कार्यक्रम और एक्सपोज़र विज़िट

बाज़ार से जुड़ाव और प्रचार-प्रसार

संस्थागत विकास और विश्वास निर्माण

(B) हार्ड इंटरवेंशन (Hard Interventions)

इनके तहत भौतिक अवसंरचना विकसित की जाती है:

कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) की स्थापना

आधुनिक मशीनों और उपकरणों की खरीद

कच्चा माल बैंक (Raw Material Bank)

भंडारण (वेयरहाउस) और कार्यशाला शेड

प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना

(C) थीमैटिक इंटरवेंशन (Thematic Interventions)

ब्रांडिंग और राष्ट्रीय स्तर के प्रचार अभियान

ई-कॉमर्स और डिजिटल मार्केटिंग

अनुसंधान एवं विकास (R&D)

नवाचार और तकनीकी उन्नयन

4. योजना का क्रियान्वयन ढांचा

स्फूर्ति योजना कई संस्थाओं के समन्वय से चलती है:

🔹 नोडल एजेंसियाँ (Nodal Agencies)

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) – खादी एवं ग्रामोद्योग क्लस्टर

कोयर बोर्ड – कोयर आधारित क्लस्टर

अन्य योग्य राष्ट्रीय संस्थाएँ भी नोडल एजेंसी बन सकती हैं।

🔹 तकनीकी एजेंसी (TA)

ये संस्थाएँ क्लस्टर के लिए DPR (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) तैयार करती हैं, प्रशिक्षण देती हैं और तकनीकी मार्गदर्शन करती हैं।

🔹 कार्यान्वयन एजेंसी (IA)

ये स्थानीय स्तर पर परियोजना लागू करती हैं और कारीगरों के साथ प्रत्यक्ष रूप से काम करती हैं।

🔹 एसपीवी (SPV – Special Purpose Vehicle)

प्रत्येक क्लस्टर के लिए एक एसपीवी बनता है, जिसमें अधिकांश सदस्य कारीगर होते हैं। परियोजना पूरी होने के बाद क्लस्टर संचालन की जिम्मेदारी इसी एसपीवी की होती है।

5. वित्तीय सहायता

क्लस्टर का प्रकार अधिकतम सहायता

नियमित क्लस्टर (500 तक कारीगर) ₹2.5 करोड़

प्रमुख क्लस्टर (500 से अधिक कारीगर) ₹5 करोड़

सॉफ्ट इंटरवेंशन – 100% सरकारी सहायता

हार्ड इंटरवेंशन – 90% (NER/पहाड़ी क्षेत्रों में 95%)

IA/एसपीवी को 10% (या 5%) योगदान देना होता है

तकनीकी एजेंसी और क्लस्टर विकास कार्यकारी (CDE) का खर्च भी योजना से कवर होता है

6. योजना की विशेषताएँ

✨ क्लस्टर आधारित विकास मॉडल

✨ पारंपरिक कौशल + आधुनिक तकनीक का संयोजन

✨ डिज़ाइन, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर विशेष फोकस

✨ डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स को बढ़ावा

✨ महिला और वंचित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित

✨ पर्यावरण अनुकूल उत्पादन पर जोर

7. अपेक्षित लाभ

कारीगरों की आय में वृद्धि
उत्पादों की गुणवत्ता और निर्यात क्षमता में सुधार
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन
पारंपरिक कला और शिल्प का संरक्षण

आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती

स्फूर्ति योजना पारंपरिक उद्योगों के लिए केवल एक वित्तीय सहायता कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक समग्र पुनर्जीवन मिशन है। यह योजना कारीगरों को संगठित कर उन्हें आधुनिक बाज़ार से जोड़ती है, जिससे उनकी कला को नया जीवन और आर्थिक स्थिरता मिलती है। यदि सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह योजना भारत के ग्रामीण आर्थिक ढांचे को मजबूत बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।